तेरी जुल्फूं के उलझन को सुलझाऊं कैसे
तेरी ओर निगाहें और दिल में शैतानी ,
कुछ इस तरह दिल पे तेरी हुस्न की मदहोशी ,
अजब सा एहसास था
या था दो वजूद का मिलन
कुछ इस तरह करीब थी तुम मेरी
हवास था बेखुद और दिल था मुतमईन
चाहत और होश व हवास पे तुम्हारी मल्कियत
न कोई गिला न कोई गम
मौसम का कुसूर या कुदरत का फरमान
हद तो तय था, दोनों थे उस पे कायम ,
मुश्किल था या यों कहें नमुमकीन
एक तरफ जुबां और एक तरफ जज़्बात
जुबान जज़्बात से जीत गया
और
हम हार के भी जीत गए......
Welcome
बस इतनी सी ख़वाहिश थी
कोई तो ,कही तो ,
किसी पल , कहीं भी ,
किया यह मुमकिन न था ,
सब वैसा ही उसी तरह
मगर
किश्मत का आरजू से दोस्ती हो न सका ,
हकीकत का ख्वाब से सुलह मुमकिन न था ,
न चाहते होए येही सच था
और में कातिल बन गया /
अरमानो का क़त्ल ,ऐतबार का क़त्ल
साहिल का वीरान सा किनारा
रात का अँधेरा ,कोई दूर दूर तक नहीं
एक झोंपरी ,अपना ठिकाना
अँधेरा दूर करने की एक कोशिश
चिराग की एक लो
और
चारों तरफ कांच के टूकडे
शायद मेरी उमीदों के ,
चिराग की रूशनी और कांच का रिफ्लेक्शन
सायेद इतनी ही रूशनी से दिल मुतमईन था
फिर एक दिन ,
चिराग को साहिल की हवा रास न आई ,
और
मेरी उम्मीद की किरने कहीं गाएब हो गयी
कितना बेवकूफ हूँ न में
कांच ,चिराग ,साहिल ,वीराने और उम्मीद का
रिश्ता ही किया है
.........
उम्मीद का टूटना ,
इंतिहा गम का
कोशिश , होंसला और तुम
कितना मुश्किल है
अपने आप से लड़ना
दम तोड़ती उमंग
और
जिंदगी की पेचीदगी
एक गुत्थी सुलझती नहीं ,
फिर से बिखराव
ए काश .............
फिर से रंगों के साथ की तम्मन्ना,
दुःख न होता घरूंदे टूटना का
हवा के बहाव में बह जाते सारी पेचीदगियां
मगर
कुदरत को यह मंज़ूर नहीं ,
और
मुझे कुदरत से गिला नहीं....
ए काश....
कियों
डूबते - उगते सूरज का दामन लाल होता है
समझता हूँ आज इस हकीकत को
आँसू के बहने से आँखे
लाल ही होती हैं
मगर
उसको यह कौन समझाए
यह तो कुदरत है
फिर भी दिल से यह आरजू निकलती है
ए काश........
सच का वास्ता दिल की आरजूवो से था
और
मतलबी बन न सका ,
मगर इस दिल को कौन समझाए ,
धरकन अभी बाकि है ,
मगर
खून में वो रवानी नहीं ,
जिंदगी को अगर यही मंज़ूर है
फिर
ज़िन्दगी कियों है
मौत और ज़िन्दगी के बीच
यह जो उलझन है
कारवां की तलाश है और भीढ़ मेरे साथ है
ए काश .......