बस इतनी सी ख़वाहिश थी
कोई तो ,कही तो ,
किसी पल , कहीं भी ,
किया यह मुमकिन न था ,
सब वैसा ही उसी तरह
मगर
किश्मत का आरजू से दोस्ती हो न सका ,
हकीकत का ख्वाब से सुलह मुमकिन न था ,
न चाहते होए येही सच था

और में कातिल बन गया /
अरमानो का क़त्ल ,ऐतबार का क़त्ल

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