साहिल का वीरान सा किनारा
रात का अँधेरा ,कोई दूर दूर तक नहीं
एक झोंपरी ,अपना ठिकाना
अँधेरा दूर करने की एक कोशिश
चिराग की एक लो
और
चारों तरफ कांच के टूकडे
शायद मेरी उमीदों के ,
चिराग की रूशनी और कांच का रिफ्लेक्शन
सायेद इतनी ही रूशनी से दिल मुतमईन था
फिर एक दिन ,
चिराग को साहिल की हवा रास न आई ,
और
मेरी उम्मीद की किरने कहीं गाएब हो गयी
कितना बेवकूफ हूँ न में
कांच ,चिराग ,साहिल ,वीराने और उम्मीद का
रिश्ता ही किया है
.........

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एक बार तम्मना ने जिन्दगी के आँचल में सर रखकर पूछा कि मैं पूरी क्यों नहीं होती तब जिंदगी ने कहा जो पूरी हो जाये वो कभी तम्मना नहीं होती

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